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चकबंदी के द्वारा जिस परिवार की जितनी भूमि खाते-खतौनियों में है उसे बिना रजिस्ट्री फीस लिए इकट्ठे चकों में दिया जाता है, जिससे किसान के लिये कृषिविधियाँ सरल हो जाती हैं और पारिश्रमिक तथा समय की बचत के साथ साथ चक की निगरानी करने में भी सरलता हो जाती है। इसके द्वारा उस भूमि की भी बचत हो जाती है जो बिखरे हुए खेतों की मेड़ों में या एक खेत से दूसरे खेत के बीच में पड़ी रह जाती है। अंततोगत्वा, यह अवसर भी प्राप्त होता है कि भविष्य के लिए गाँव के विकासीय संस्थानों, सड़कों एवं मार्गों की भी योजना बनाकर सुधार किया जा सके। कुल मिलाकर चकबंदी के अंतर्गत किसान के बिखरे खेतों को एक स्थान में एकत्रित किया जाता है।
चकबंदी क्या है?
पारिवारिक बटवारों के चलते खेती की भूमि छोटे छोटे टुकड़ों में दूर दूर बिखरने की वजह से कृषि-बागवानी की आधुनिक तकनीक को नहीं अपनाया जा सकता. पहाड़ों के सीढ़ीदार खेतों में जुताई के लिए हल-बैल या मशीनें ले जाने में काफी समस्याएं होती हैं. जिसके लिए किसानों के बिखरे हुए जमीन के टुकड़ों की कुल भूमि को एक ही जगह पर बड़े खेत या चक के रूप में किया जाता है. इसी को चकबंदी कहते हैं.
चकबंदी कैसे होती है ?
चकबंदी दो प्रकार से होती है:-
- पहली- स्वैच्छिक. इसे ऐच्छिक चकबंदी भी कहते हैं.
स्वैच्छिक चकबन्दी का मतलब ऐसी चकबंदी से है, जो किसानों की आपसी सहमति अर्थात कृषकों की इच्छा पर निर्भर होती है. इस प्रकार की चकबंदी करानें के लिए किसानों पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जाता है जिससे चकबंदी के बाद किसानों के बीच सौहार्दपूर्ण वातावरण भी बनता है.
भारत में स्वैच्छिक चकबन्दी की शुरुआत 100 साल पहले 1920-21 में पंजाब प्रान्त में सहकारी समितियों द्वारा की गयी थी. जिनमें मध्य प्रदेश, गुजरात और पश्चिम बंगाल में स्वैच्छिक चकबन्दी क़ानून आज भी लागू है.
- दूसरी- अनिवार्य चकबंदी.
इसे कानूनी चकबंदी भी कहते है. अनिवार्य चकबन्दी का आशय एक ऐसी प्रक्रिया से है, जिसमें किसानों को अनिवार्य रूप से चकबन्दी करानी पड़ती है. इस प्रकार की चकबंदी में काफी समय लगता है तथा इसमें विवाद होनें की सम्भावनायें काफी होती है. केरल, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा और मेघालय में चकबन्दी से सम्बंधित कोई क़ानून नहीं है। इन राज्यों के अलावा अन्य सभी राज्यों में अनिवार्य चकबन्दी क़ानून लागू है।